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श्राद्धविधि का इतिहास तथा पितृदोष से रक्षा

Newsvision Live by Newsvision Live
September 22, 2021
in विविध
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श्राद्धविधि का इतिहास तथा पितृदोष से रक्षा
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श्राद्ध में पितरों तथा देवताओं को नेवैद्य दिखाना, एक महत्त्वपूर्ण क्रिया है । इसलिए इसका शास्त्र जानना आवश्यक है । ‘श्रद्धा’ शब्द से ‘श्राद्ध’ शब्द की निर्मिति हुई है । इहलोक छोड गए हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए जो कुछ किया, वह उन्हें लौटाना असंभव है । पूर्ण श्रद्धा से उनके लिए जो किया जाता है, उसे ‘श्राद्ध’ कहते हैं । ‘श्राद्ध’ का अर्थ पितरों का मात्र कृतज्ञतापूर्वक स्मरण नहीं; अपितु यह एक विधि है ।’

श्राद्धविधि का इतिहास

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‘श्राद्धविधि की मूल कल्पना ब्रह्मदेव के पुत्र अत्रिऋषि की है। अत्रिऋषि ने निमी नामक अपने एक पुरुष वंशज को ब्रह्मदेव द्वारा बताई गई श्राद्ध विधि सुनाई। यह रूढ आचार आज भी होता है।

मनु ने प्रथम श्राद्धक्रिया की, इसलिए मनु को श्राद्धदेव कहा जाता है।

लक्ष्मण एवं जानकी सहित श्रीराम के वनवास-प्रस्थान के उपरांत, भरत वनवास में उनसे जाकर मिलते हैं एवं उन्हें पिता के निधन का समाचार देते हैं। तदुपरांत श्रीराम यथाकाल पिता का श्राद्ध करते हैं।

इतिहास क्रम से रूढ हुई श्राद्ध की तीन अवस्थाएं एवं वर्तमान काल की अवस्था – अग्नौकरण, पिंडदान (छोटे बच्चे एवं संन्यासियों के लिए पिंडदान नहीं किया जाता; क्योंकि उनकी शरीर में आसक्ति नहीं होती), ब्राह्मण भोजन

वर्तमान काल में पूर्व की भांति कोई श्राद्ध-पक्ष इत्यादि नहीं करता और न ही साधना करता है। इसलिए अधिकतर सभी को पितृदोष (पूर्वजों की अतृप्ति के कारण कष्ट) होता है। आगे पितृदोष की संभावना है या वर्तमान में हो रहा कष्ट पितृदोष के कारण है, यह केवल उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं। किसी उन्नत पुरुष से भेंट संभव न हो, तो यहां पितृदोष के कुछ लक्षण दिए हैं – विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भधारण होने पर गर्भपात हो जाना, संतान का समय से पूर्व जन्म होना, मंदबुद्धि अथवा विकलांग संतान होना, संतान की बचपन में ही मृत्यु हो जाना आदि। व्यसन, दरिद्रता, शारीरिक रोग, ऐसे लक्षण भी हो सकते हैं।

दत्तात्रेय भगवान के नामजप ‘श्री गुरुदेव दत्त’ से पितृदोष से रक्षा होती है।

‘श्री गुरुदेव दत्त’ नामजप से निर्मित शक्ति से नामजप करने वाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है और पूर्वजों को गति प्राप्त होती है। अधिकांश लोग साधना नहीं करते। अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं। इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है व मृत्युलोक में अटक जाते हैं। दत्त के नामजप के कारण मृत्युलोक में अटके पूर्वजों को गति मिलती है और वे अपने कर्म के अनुसार आगे के लोक में जाते हैं। इससे स्वाभाविक रूप से उनसे व्यक्ति को होनेवाले कष्ट की तीव्रता घट जाती है।

किसी भी प्रकार का कष्ट न हो रहा हो, तो भी आगे चलकर कष्ट न हो इसलिए, साथ ही यदि थोडा सा भी कष्ट हो तो ‘श्री गुरुदेव दत्त।’ नामजप 1 से 2 घंटे करें। शेष समय प्रारब्ध के कारण कष्ट न हो इस हेतु एवं आध्यात्मिक उन्नति हो इसलिए सामान्य मनुष्य अथवा प्राथमिक अवस्था का साधक कुलदेवता का अधिकाधिक नामजप करे।

मध्यम कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ‘श्री गुरुदेव दत्त।’ नामजप प्रतिदिन 2 से 4 घंटे करें। गुरुवार को दत्तमंदिर जाकर सात परिक्रमाएं करें एवं बैठकर एक-दो माला जप वर्षभर करें। तत्पश्चात तीन माला नामजप जारी रखें।

तीव्र कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ही ‘श्री गुरुदेव दत्त।’ नामजप प्रतिदिन 4 से 6 घंटे करें। किसी ज्योतिर्लिंग में जाकर नारायण बलि, नाग बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध, काल सर्पशांति आदि विधियां करें। साथ ही किसी दत्तक्षेत्र में रहकर साधना करें अथवा संत सेवा कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करें।

श्राद्धकर्म में वर्जित वस्तुएं – वायविडंग, काली मिर्च, बिजौरा नींबू, चिचिंडा एवं राम दाना, लोहे एवं इस्पात (स्टील) धातु के बरतन, लाल रंग के फूल

ब्राह्मण द्वारा ग्रहण किया गया अन्न पितरों को कैसे पहुंचता है ?

‘श्राद्धादि कर्मों में मंत्रोच्चारण से ब्राह्मण (पुरोहित) की देह में स्थित ब्राह्मतेज जागृत होता है। ऐसे पुरोहित जब पितरों का आवाहन और विश्वेदेवों से प्रार्थना कर उनके अन्नोदक (पिंड) पर अभिमंत्रित जल छोडते हैं; तब उस पिंड से सूक्ष्म-वायु मुक्त होती है, जो पितरों को मिलती है ।जिसका ब्राह्मतेज जागृत हो, ऐसा पुरोहित जब पितरों का नाम लेकर उन्हें भोजन अर्पित करता है, तब उसे, श्राद्धकर्ता व्यक्ति और पितरों का पुण्य मिलता है। इसके अतिरिक्त, पुरोहितों का आशीर्वाद भी पितरों को मिलता है, जिससे उनकी गति और बढ जाती है।

अधिकतर लोग समझते हैं कि पितरों के नाम से ब्राह्मण – भोजन कराना हमारा कर्तव्य है। परंतु, ऐसा विचार न कर, यह मानना चाहिए कि ‘ब्राह्मणों के माध्यम से प्रत्यक्ष पितर ही भोजन कर रहे हैं।’ ऐसा सोचने पर, ब्रह्मभोज से संतुष्ट ब्राह्मणों की देह से आशीर्वाद की जो तरंगें निकलती हैं, उससे पितरों को शक्ति मिलती है।

श्राद्ध करते समय पितरों के नाम एव गोत्र का केवल उच्चारण करने से श्राद्ध का हव्य (भोजन) उन्हें कैसे मिलता है?

अध्यात्मशास्त्र के अनुसार, ‘जहां शब्द है, वहां उसकी  शक्ति, स्पर्श, रूप, रस और गंध भी रहती है।’ कोई भी वस्तु, सूक्ष्म पंचतत्त्व-तरंगों का घनीभूत रूप है। प्रत्येक वस्तु शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से युक्त तथा पंचतत्त्वों की सहायता से बनी होती है। श्राद्धकर्म में पितरों के नाम एवं गोत्र का उच्चारण करने से वायुमंडल में जो तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे मंत्रों की सहायता से गतिमान होती हैं और वायुमंडल में भटकने वाली उन लिंगदेहों के वासना मय कोष में प्रवेश कर उन्हें श्राद्ध स्थल पर लाती हैं, जिनका नाम मंत्रोच्चार में लिया गया होता है। इस प्रकार, विशिष्ट नाम और गोत्र के पितर श्राद्ध स्थल पर विशिष्ट मंत्र शक्ति से आकर्षित होकर आते हैं और श्राद्ध का भोजन कर, तृप्त होते हैं। पितरों की नाम ध्वनियों से वायुमंडल में जो तरंगें उत्पन्न होती हैं, उन्हें श्राद्ध में बोले जाने वाले मंत्रों से ऊर्जा मिलती है । तब, इन ऊर्जा युक्त तरंगों का सूक्ष्म प्रभाव वायुमंडल पर पडता है, जिससे पितर वायुरूप अथवा स्पर्श रूप में हव्य ग्रहण करने के लिए बाध्य होते हैं।’

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